कृषि विकास एवं पर्यावरण प्रदूषण: भदोही जनपद का एक प्रतीक अध्ययन

 

डाॅ0 उमेश कुमार मिश्र

प्रवक्ता, भूगोल गोपीनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय देवली, सलामतपुर गाजीपुर.

*Corresponding Author E-mail: umeshmishra7843@gmail.com

 

ABSTRACT:

प्रस्तुत शोध पत्र भदोही जनपद में कृषि विकास एवं पर्यावरण से सम्बन्धित है। अध्ययन क्षेत्र मुख्यतः प्रवाह प्रणालियों में गंगा वेसिन के अनुकूल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व दिशा में प्रवाहित होने वाली नदियों द्वारा निर्मित मैदान के उपजाऊ भू-भाग में होने के कारण जनपद में उपजाऊ एवं जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है। प्राचीन समय में कृषि परम्परागत यंत्रो से की जाती थी, जिसमें समय अधिक लगता था, लेकिन किसी प्रकार की पर्यावरणीय या पारिस्थितिकी की समस्या उत्पन्न नहीं होती थी। परंतु जनसंख्या की अतिशय वृद्धि के साथ-साथ खाद्यान्न की समस्या भी उत्पन्न होने लगी, जिससे कृषि में अधिक उत्पादन हेतु नये-नये प्रयोग किये जाने लगे। जिसका प्रभाव हमारे पर्यावरण और परिस्थितिकी असंतुलन की समस्या उत्पन्न होती जा रही है, जिसके अन्तर्गत कृषक अपने खेत में जैविक एवं अजैविक घटकों (पर्यावरण) में संतुलन रखते हुए कृषि कार्य करता है। खेत स्वयं एक पूर्ण परिस्थितिकी तंत्र है। खेत में पौधें, जीवाणु, कवक, जीव-जन्तु जैव कारक है एवं खनिज, लवण, प्राकृतिक एवं कृत्रिम खाद तथा अन्य रसायन अजैविक घटक है। ये दोनों घटक परस्पर प्रतिक्रिया करते हैं एवं जब इसकी मात्रा अधिक हो जाती है तो कृषि भूमि प्रदूषित होने लगती है। वर्तमान समय में नये-नये प्रयोग से इसमें और वृद्धि हुई है।

 

KEYWORDS: कृषि विकास, पर्यावरण प्रदूषण।

 

 


 


प्रस्तावना -

अध्ययन का उद्देश्य:-

1-   कृषि विकास एवं पर्यावरण का अध्ययन करना।

2-   क्षेत्रीय कृषि विकास के आयामों का विश्लेषण करना एवं पर्यावरणीय प्रभाव की समीक्षा करना।

3-   क्षेत्र में कृषि एवं पर्यावरण का सम्बन्ध स्थापित करना और उसके महत्व को बतलाना।

4-   प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उसकी उपयोगिता पर बल देना।

 

आँकड़ो का स्रोत:-

यह शोध पत्र मुख्यतः द्वितीयक आंकड़ो पर आधारित है। अध्ययन विषय जनपद भदौही के कृषि विकास और पर्यावरण से सम्बन्धित है। द्वितीयक आंकड़ो कीप्राप्ति समाचार पत्र साप्ताहिक एवं मासिक पत्रिका और सम्बन्धित आंकड़े विभिन्न कार्यालयों से लिया गया है।

 

अध्ययन क्षेत्र:-

भदोही जनपद के गठन की घोषणा 01 सितम्बर सन् 1993 में हुई, जिसका मूर्त रूप 30 जून 1994 में वाराणसी से अलग होकर एक नवसृजित स्वतंत्र जनपद के रूप में अस्तित्व में आया। उत्तर भारत के मध्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में भदोही जनपद का अक्षांशीय विस्तार 25010’ उत्तरी अक्षांश से 250 32’15’’ अक्षांश तथा 82 12’ 24’’ पूर्वी देशान्तर से 82042’ 28’’ पूर्वी देशान्तर के मध्य में स्थित है। भदोही जनपद का विस्तार उत्तर से दक्षिण 41.16 कि0मी0 एवं पूरब से पश्चिम अधिकतम विस्तार 49.49 कि0मी0 है। यह जनपद प्रदेश (उत्तर प्रदेश) मुख्यालय से लगभग 326 कि0मी0 दक्षिण-पूर्व, वाराणसी से 60 कि0मी0 पश्चिम, इलाहाबाद से 64 कि0मी0 पूर्व, जौनपुर से 53 कि0मी0 दक्षिण एवं मिर्जापुर से 38 कि0मी0 उत्तर दिशा में अवस्थित है। इस जनपद का सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्रफल 1056 वर्ग कि0मी0 था। जिसमें सात विकासखण्ड (भदोही, सुरियावाॅ, ज्ञानपुर, औराई, डीघ, रामपुर बरसठी) थे। जिसमें से रामपुर और बरसठी विकासखण्ड़ को जनपद जौनपुर में सन् 1997 में मिला दिया गया।

 

वर्तमान समय में इसका कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 1015 वर्ग कि0मी0 है, जो उत्तर प्रदेश के 0.44 प्रतिशत क्षेत्र को अपने में समाहित करता है। प्रशासनिक दृष्टि से मिर्जापुर मण्डल के इस जनपद में तीन तहसीलें - ज्ञानपुर, औराई भदोही एवं 6 विकासखण्ड़ों - ज्ञानपुर, औराई, भदोही, सुरियावाॅ, डीघ और अभोली है। जिसमें ज्ञानपुर तहसील के अन्तर्गत ज्ञानपुर एवं डीघ विकासखण्ड, भदोही तहसील के अन्तर्गत - भदोही, सुरियावाॅ एवं अभोली विकासखण्ड एवं औराई तहसील के अन्तर्गत-औराई विकासखण्ड आते हैं। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 1578213 है और जनघनत्व 1555 प्रति व्यक्ति वर्ग कि0मी0 है। जिसमें 1348911 ग्रामीण एवं 229302 नगरीय जनसंख्या है। जो प्रदेश की जनसंख्या का 0.79 प्रतिशत भाग है। जनपद में 1224 गाॅवों (1087 आबाद गाॅवों 137 गैर आबाद गाॅव) में विभक्त है। जनपद में कुल सात नगरीय क्षेत्र - भदोही, नई बाजार, ज्ञानपुर, गोपीगंज, सुरियावाॅ, खमरियाॅ घोसिया बाजार है और 79 न्याय पंचायते स्थित है। जनपद का मुख्यालय ज्ञानपुर में स्थित है।

 

शोध प्रविधि:-

कृषि विकास समय के साथ बदलता रहता है। कभी-कभी एक क्षेत्र का विकास अधिक हो जाता है और दूसरे पिछड़ जाते है इस प्रकार क्षेत्रीय असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है यह स्थिति एक क्षेत्र के विकास पर अधिक संसाधनों के जुटाने से भी उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार क्षेत्रीय विषमताएँ उत्पन्न होती है।

 

इस तरह की कृषि में क्षेत्रीय विभिन्नताएँ कृषि विकास की गतियों को बताती है। यह गतियाॅ समय के साथ-साथ बदलती है तथा विकास क्षेत्रों के विकास को विभिन्न स्तरनुमा बना देती है। कृषि विकास में इन स्तरों का अधिक महत्व माना जाता है क्योंकि आर्थिक दृष्टि से एक क्षेत्र अधिक विकसित और दूसरा अविकसित हो जाता है।

 

कृषि विकास में पूर्ण विकास की गतियाॅँ भी भिन्न होती है क्योंकि जलवायु, धरातल, मिट्टी आदि ऐसे प्राकृतिक तत्व है जो कृषि विकास को प्रभावित करते हैं।

 

प्राचीन समय में कृषि परम्परागत यंत्रों से की जाती थी, जिसमें समय अधिक लगता था, लेकिन किसी प्रकार की पर्यावरणीय या पारिस्थितिकी की समस्या उत्पन्न नहीं होती थी। परंतु जनसंख्या की अतिशय वृद्धि के साथ-साथ खाद्यान्न की समस्या भी उत्पन्न होने लगी, जिससे कृषि में अधिक उत्पादन हेतु नये-नये प्रयोग किये जाने लगे। जिसका प्रभाव हमारे पर्यावरण और परिस्थितिकी असंतुलन की समस्या उत्पन्न होती जा रही है, जिसके अन्तर्गत कृषक अपने खेत में जैविक एवं अजैविक घटकों (पर्यावरण) में संतुलन रखते हुए कृषि कार्य करता है। खेत स्वयं एक पूर्ण परिस्थितिकी तंत्र है। खेत में पौधें, जीवाणु, कवक, जीव-जन्तु जैव कारक है एवं खनिज, लवण, प्राकृतिक एवं कृत्रिम खाद तथा अन्य रसायन अजैविक घटक है। ये दोनों घटक परस्पर प्रतिक्रिया करते हैं एवं जब इसकी मात्रा अधिक हो जाती है तो कृषि भूमि प्रदूषित होने लगती है। वर्तमान समय में नये-नये प्रयोग से इसमें और वृद्धि हुई है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन् 1953 में सामुदायिक कार्यक्रम के अन्तर्गत ‘‘राष्ट्रीय प्रचार सेवा’’ कार्यक्रम प्रारंभ किया गया तथा विकासखण्डों की स्थापना की गयी जिसका मुख्य कार्य किसानों को विकास सुविधाओं से अवगत क्रियान्वित कराना था। परंतु किन्हीं कतिपय कारणों से यह योजना सफल नहीं हो सकी। इसलिये कृषि कार्य को और उन्नत रूप देने के लिये कृषि विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रारंभ में कुछ चयनित जनपदों तत्पश्चात् समग्र जनपदों में जनपदीय गहन कृषि कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। इसके साथ-साथ गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम भी विभिन्न क्षेत्रों में लागू किया गया।

 

वर्तमान समय में अधिक उत्पादन हेतु कृषि में व्यापक स्तर पर मशीनीकरण हुआ। पशु शक्ति के स्थान पर मशीनों से कार्य किया जाने लगा। जिससे पशुओं की संख्या कम होती जा रही है, परिणामस्वरूप जनपद के कृषि में परम्परागत खादों का भी प्रयोग कम होने लगा है। यहीं नहीं यंत्रों के प्रयोग से खेत में विद्यमान जैविक घटकों का तीव्र गति से विनाश होता है और खेत के जैविक घटक असंतुलित होकर उत्पादकता को घटा देते हैं, अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु कृषि में रासायनिक खादों का अन्धाधुन्ध प्रयोग हो गया। जिससे उपज में अतिशय वृद्धि हो गयी और धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदलती जा रही है। कृषि में सिंचाई तीव्र गति से बढ़ा है जिसके लिए छोटी-बड़ी नहरें निकाली गयी। जिससे कृषि में उपज में विविधता के साथ ही साथ उत्पादन में भी वृद्धि हुई है लेकिन इसका दूरगामी नकारात्मक परिणाम परिलक्षित हो रही है। अनियोजित सिंचाई से कृषि क्षेत्र में भारी हानि उठानी पड़ रही है। नहरों एवं जलाशयों के किनारे जल जमाव होने से एक तरफ जहाॅ अनेक प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो रही है। अनियोजित सिंचाई से भूमि दलदल होती जा रही है, ऊसर क्षेत्र में वृद्धि होती जा रही है तथा जल प्लावन में भी वृद्धि हो रही है।

 

आधुनिक कृषि पद्धितियों से यद्यपि उत्पादन बढ़ा है। लेकिन इस उत्पादन द्वारा प्राप्त लाभ की तुलना में इससे होने वाली क्षति कहीं अधिक है। कारण यह है कि आधुनिक कृषि पर्यावरण एवं परिस्थितियों के लिये घातक सिद्ध हो रही है, जिसके चलते भूमि प्रदूषण, जल-प्रदूषण एवं वायु प्रदूषण जैसी अनेक समस्याएॅ तो उत्पन्न होती है। वही हमारा सम्पूर्ण परिस्थितिकी तंत्र भी अव्यवस्थित होता जा रहा है जो हमारे लिये विशेष हानिकारक है।

 

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आधुनिक कृषि को हम पूर्णतया नकार भी नहीं सकते, कारण कि अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि के लिये हमें खाद्यान्न की अधिक आवश्यकता है। अतः आवश्यकता इस बात कि है हम आधुनिक कृषि एवं परम्परागत कृषि के मध्य समन्वय स्थापित करें। अन्धाधुन्ध उर्वरकों, कीटनाशकों एवं अनियोजित सिंचाई के स्थान पर उनके समुचित उपयोग पर ध्यान देना होगा तथा साथ ही साथ देशी खाद एवं बीज का प्रयोग करना पडे़गा। कीड़ों की समाप्ति हेतु कीटनाशकों का अन्धाधुन्ध प्रयोग करके जैविक आधार पर प्राकृतिक रूप से ही इन्हे विनष्ट करने का उपाय ढूढ़ना पडे़गा। इस प्रकार आधुनिक कृषि एवं परम्परागत कृषि में समन्वय स्थापित कर ही पर्यावरण की सुरक्षा करते हुए विकास की दिशा में सुनिश्चित कर सकते हैं।

 

पर्यावरण प्रदूषण (मृदा, जल एवं वायु) -

मनुष्य ने आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक में विकास, प्रौद्योगिकी, रासायनिक खादों के उत्पादन तथा उपभोग में वृद्धि, सिंचाई के साधनों एवं सुविधाओं में वृद्धि तथा विस्तार, अधिक उत्पादन वाले बीजों के विकास आदि के माध्यम से कृषि में पर्याप्त विस्तार एवं विकास यथा-कृषि क्षेत्रों में विस्तार, कृषि की उत्पादकता में वृद्धि तथा शुद्ध कृषि उत्पादन में वृद्धि किया है तथा निरन्तर बढ़ती मानव जनसंख्या के कारण बढ़ती खाद्यानों की मांग की पूर्ति तो कर दी है परंतु साथ ही साथ घातक पर्यावरणीय समस्याओं को भी जन्म दिया है। बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए कृषि के विस्तार एवं विकास की गति को निश्चय ही कायम रखना है लेकिन साथ ही साथ यह भी देखना होगा कि कृषि के विकास की बढ़ती गति के कारण पर्यावरण की समस्या कही भयावह हो जाय। स्पष्ट है कि आधुनिकआर्थिक एवं प्रौद्योगिकी मानव उस चैराहे पर खड़ा है जिसके चारो ओर खतरा ही खतरा है यदि जनसंख्या वृद्धि जारी रही तो हमें कृषि विस्तार की ओर वृद्धि करनी ही होगी तथा ऐसा करते समय हमें अपने विनाश के लिये अपने ही द्वारा निर्मित समय बम से निपटनेे के लिये भी तैयार रहना पडे़गा।

‘‘आजकल मनुष्य स्वयं ही अनेक प्रकार के जहरीले तत्व पर्यावरण फैलाकर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्राकृतिक पर्यावरण अथवा वायुमण्डल को दोषपूर्ण बना रहा है। मनुष्य, पशु, वनस्पति जगत मात्र ही नहीं अपितु कला एवं संस्कृतियों के प्रतीक भी इसके विषैले प्रभाव से बच नहीं पा रहे हैं।’’ (जिन्दल)

 

मानव औद्योगिक विकास, नगरीकरण, परमाणु ऊर्जा आदि के द्वारा लाभान्वित हुआ है परंतु भविष्य में होने वाले अति घातक परिणामों की अवहेलना की है जिस कारण पर्यावरण का संतुलन डगमगा गया है। फलस्वरूप वायु, जल, भूमि, ध्वनि, आदि में प्रदूषण उत्पन्न हो गया है। मानव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अनेक विनाशक तत्वों को फैलाकर पर्यावरण को प्रदूषित किया है।

 

खेतों में वर्षा के जल से जब रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशी कृत्रिम रसायन बहकर झीलों, जलाशयों और नदियों में पहुँचते हैं, तो उसमें होने वाले प्रदूषण को नाॅनप्वाइंट प्रदूषण कहते हैं। यह प्रदूषण कभी भी दृश्य नहीं होता है। नाॅन प्वाइण्ट प्रदूषण मुख्य रूप से कृषि कार्यो से होता है। फसलों की वृद्धि के लिये रासायनिक उर्वरकों तथा फसलों को रोगों एवं कीटाणुओं से बचाने के लिये रोगनाशी एवं कीटनाशी कृत्रिम रसायनों का प्रयोग किया जाता है। ये रसायन वर्षा के जल के कारण खेतों से बहकर घुले एवं ठोस रूप में जलाशयों, नदियों झीलों में पहुॅचते रहते हैं। कृषि विकास में प्रदूषण को दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैं - 1. ग्रामीण प्रदूषण  2. नगरीय प्रदूषण।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण का मुख्य स्रोत कृषि कार्य है। क्योंकि ग्रामीण प्रदूषण मुख्य रूप से कृषि कार्यो पर ही आधारित होती है। इसे कृषि प्रदूषण भी कहते है। खेतों में किसानों द्वारा डाली जाने वाली रसायनिक खादों, कीटनाशी, शाकनाशी एवं रोगनाशी कृत्रिम रसायनों की विशेषताएॅँ कृषि वाली मृदा पर आधारित है। कृषकों द्वारा फसलों की सुरक्षा हेतु कीटनाशी एवं कीट निरोधी दवाएँ विषैली होती है, जो खाद्य सामग्री को विषाक्त बना देती है अन्य साग-सब्जियों एवं फलों के माध्यम से विषैले पदार्थो को मानव शरीर भी ग्रहण करता है। शरीर में प्रविष्ट को जाने पर यही विषैले पदार्थ अनेक रोगों के जनक बन जाते हैं।

 

मृदा प्रदूषण -

मिट्टी कृषकों का अमूल्य धन है। मिट्टियाॅ पौधों के उद्भव विकास तथा सम्बर्द्धन के लिये प्रयुक्त होती है। प्रदूषित मिट्टियों में पौधों का उद्भव एवं विकास सम्भव नहीं होता है। मिट्टी प्रदूषण मानव जनित स्रोतों अथवा प्राकृतिक स्रोतों अथवा दोनों के द्वारा उत्पन्न होता है। परिणामस्वरूप मिट्टी की मौलिकता में ह्यस होती है। इसकी उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। इसका प्रभाव जीव-जन्तु, वनस्पतियों तथा मनुष्यों पर पड़ता है। लवण, खनिज तत्व, कार्बनिक तत्व, गैस, जल आदि का एक निश्चित अनुपात में व्यवधान उत्पन्न होता है तब इसकी मौलिकता में ह्यस होती है और इसे मिट्टी प्रदूषण की संज्ञा दी जाती है। मिट्टी प्रदूषण एक जटिल समस्या है। भूतल का कुप्रबन्धन इसका मुख्य कारण है। मिट्टी में अनेक खनिज एवं कार्बनिक पदार्थ होते हंै। जिससे पौधों का पोषण नष्ट होता है। एक बार इसकी उत्पादन क्षमता नष्ट होने पर पुनः बनने में काफी समय लगता है।

 

मृदा वास्तव में जीवमण्डल जीवन परत का हृदय स्थल है भूमि उपयोग में व्यापक परिवर्तन के कारण मिट्टियों का तीव्र गति से अपरदन, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशी, रोगनाशी तथा शाकनाशी, औद्योगिक एवं नगरीय क्षेत्रों के प्रदूषित अपशिष्ट, जल सिंचाई के रूप में प्रयोग कतिपय हानिकारक सूक्ष्म जीव, वनों में आग लगना, जल जमाव आदि मृदा प्रदूषण में महत्वपूर्ण योगदान होता है। वर्तमान समय में बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिये अत्यधिक उत्पादन कृषि से प्राप्त करना लक्ष्य बन गया है। अन्धाधुन्ध रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जा रहा है। कीट-रोग एवं शाकनाशी रासायनों से बैक्टिरिया तथा सूक्ष्म जीव नष्ट होते जा रहे हैं। परिणामस्परूप मिट्टी के गुणों में ह्यस होता है। अध्ययन क्षेत्र में मृदा प्रदूषण का प्रभाव कृषि विकास में दिया जा रहा है।

 

जल प्रदूषण -

जल समस्त जीवधारियों की एक आधारभूत आवश्यकता है। यह पर्यावरण का जीवदायी तत्व है। वनस्पति एवं प्राणियों की समस्त जैविक क्रियाओं में जल की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। मानव पेयजल के अतिरिक्त कृषि, उद्योग, परिवहन इत्यादि कार्यो के लिये जल की आवश्यकता होती है। लेकिन मानव अपने ही क्रिया कलापों से इसे दूषित कर रहे हैं।

 

जल की रासायनिक, भौतिक जैविक विशेषताओें में मुख्यतः मानवीय क्रिया-कलापों से ह्यस जाना ही जल प्रदूषण है। (गिलथिन)

जब प्राकृतिक या अन्य स्रोतों से वाह्य पदार्थ जल से मिल जाते हैं, जिनका दुष्प्रभाव जीवों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जल में विषाक्ता जाती है, जल के सामान्य आॅक्सीजन स्तर में गिरावट आती है, जल जनित महामारियाँ फैलती है तथा अन्य दुष्प्रभाव पड़ते हैं, तो उसे जल प्रदूषण कहते हैं।

 

उद्योगों से निकलने वाले जल में मिले हुए हानिकारक रसायन मृदा की उर्वरता नष्ट करते है, जिससे भूमि बंजर होती है। जनपद भदोही में नगरी सिंचाई क्षेत्रों मंे क्षारियता लवणीयता बढ़ने से कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। प्रदूषित जल से सिंचाई करने पर मृदावासी सूक्ष्म जीव बैक्टिीरिया मर जाते हैं जिनकी उपस्थिति भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिये अनिवार्य होती है। औद्योगिक नगरी होते हुए भी जनपद भदोही में जल निकासी की समुचित प्रबन्ध नहीं है। जल शोधन प्लान्ट भी नहीं होने के कारण सारा दूषित जल नदियों में पहुँच रहा है। शहर से प्रतिदिन निकलने वाला 11 एम0डी0एल0 गंदा पानी नालों के जरिए मोरवाॅ और वरूणा नदियों मंे बहा दिया जाता है। जो बाद में गंगा नदी में घुल जाता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण इसको लेकर गंभीर है यहाँ तक अधिकरण ने शहर में संचालित ऊन रंगाई संयंत्रों को बन्द करा दिया था। शर्ते पूरी होने के बाद ही उन्हें संचालन की अनुमति दी गयी, नगर के कालीन निर्यातकों का मानना है कि औद्योगिक इकाईयों से गंदे पानी के प्रवाह पर तो अधिकांश ने तो रोक लगा दी, लेकिन नालों के माध्यम से नदियों में बहाए जा रहे हैं प्रदूषित जल पर कब रोक लगेगी?

 

वरूणा नदी राजघाट से फुलवरिया (39 जी0टी0सी0 कैन्टोमेन्ट) तक लगभग 20 कि0मी0 क्षेत्र तक बदबूदार गन्दे नाले में तब्दील हो जाती है। मात्र इस 20 कि0मी0 के क्षेत्र में बड़े-बड़े सीवर, ड्रेनेज खुले आम बहते देखा जा सकता है। शहरी क्षेत्र में लगभग सत्रह नाले प्रत्यक्षतः वरूणा नदी में मल गन्दगी गिरते देखे जा सकते हैं। कोढ़ में खांच की तरह जनपद मुख्यालय से सटे वरूणा पुल पर से प्रतिदिन मृत पशुओं के शव और कसाई खाने के अवशेष, होटलों, चिकित्सालयों के अवशिष्ट पदार्थ वरूणा नदी में गिराये जाते हैं। प्रदूषण बोर्ड के सदस्यों द्वारा कुछ समय पहले जनपद भदोही में कई स्थानों से पानी का नमूना लिया था इसकी जाँच के आँकड़े चैकाने वाले थे कालीन नगरी से प्रति लीटर पानी में 3.4 मिली आर्सेनिक और 2.9 मिली क्रोमियम पाई गई। इस जहरीले पानी से कृषि योग भूमि बंजर हो रही है। वही इस जहरीले पानी से विभिन्न प्रकार की बिमारियों को जन्म दे रही है।

 

वायु प्रदूषण -

समस्त जीवधारियों के लिए वायु एक आवश्यक तत्व है जो पृथ्वी के चारो तरफ से घेरे हुए है तथा विभिन्न गैसों का यांत्रिक मिश्रण है इसमें नाइट्रोजन (78.09 प्रतिशत), आॅक्सीजन (20.95 प्रतिशत), आॅर्गन (0.93) तथा कार्बन डाई आॅक्साइड (0.03 प्रतिशत) है। इसके अतिरिक्त नियान, क्रिप्टान, हीलियम, हाइड्रोजन, जेनान, ओजोन आदि गैसे भी वायुमण्डल में मौजूद है।

 

जनद भदोही में काती रंगाई के लगे डांईग प्लांट के कारण छतों पर सूखने के लिए डाले गये कपड़ो पर काले कण जमा हो जाते हैं। यही कण आँख में पड़कर आँखों की बिमारी को बढ़ावा दे रहे हैं। उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाली विभिन्न प्रकार की गैंसे कार्बन डाई आॅक्साइड, कार्बन मोनो-आॅक्साइड, सल्फर डाई -आक्साइड आदि हाइड्रोकार्बन्स, धुआं इत्यादि वायु-प्रदूषण के प्रमुख कारक है। आधुनिक कृषि पद्धति से भी वायु प्रदूषण बढ़ा है। इसका प्रमुख कारण कीट नाशकों का बढ़ता प्रयोग है। किसानों द्वारा फसलों में होने वाली विभिन्न बिमारियों की रोकथाम के लिये अनेक प्रकार के घातक रसायनों का छिड़काव किया जाता है। छिड़काव के दौरान इन रसायनों की कुछ मात्रा सीधे वायुमण्डल में प्रवेश कर जाती है, जिसका अत्यन्त घातक प्रभाव जीवों पर पड़ता है। अनेक कीटनाशी रसायनों का स्थायी प्रभाव बहुत लम्बे समय तक बने रहने से दीर्घकाल तक हानि पहुँचाते हैं यथा डी0डी0टी0, बी0एच0सी0, डिएल्ड्रिन, एल्ड्रिन आदि। इससे यह ज्ञात होता है कि वायु प्रदूषण की पर्यावरण प्रदूषण का अंग है जिससे कृषि विकास में विपरीत प्रभाव पड़ता है।

 

पर्यावरणीय प्रभाव -

पर्यावरणीय प्रदूषण के कुछ प्रभाव सामने आये है जो इस प्रकार है-

1.  पर्यावरण का मृदा, वायु, जल पर प्रभाव।

2.  पर्यावरणीय गुणवत्ता में कमी।

3.  उपजाऊ भूमि का नगरीय उपयोग में उपयोग।

4.  मानव, पशु, पक्षी, पादप जगत पर प्रभाव।

5.  भूमिगत जल पर प्रभाव।

6.  कृषि उत्पादन पर प्रभाव।

7.  आधुनिक कृषि का पर्यावरण पर प्रभाव।

 

निष्कर्ष:-

शहर से प्रतिदिन निकलने वाला 11 एम.डी.एल. गंदा पानी नालों के जरिये मोरवा और वरूणा नदियों में बहा दिया जाता है। जो बाद में गंगा नदी में घुल जाता है। प्रदूषण बोर्ड के सदस्यों द्वारा कुछ समय पहले जनपद भदोही में कई स्थानों ने पानी का नमुना लिया था। जिसकी जाॅच के आंकड़े कई स्थानों से पानी का नमूना लिया था इसकी जाॅच के आॅकड़े चैकाने वाले थे कालीन नगरी से प्रति लीटर पानी में 3.4 मिली आर्सेनिक और 2.9 मिली क्रोमियम पाई गई। इस जहरीले पानी से कृषि योग भूमि बंजर हो रही है। वही इस जहरीले पानी से विभिन्न प्रकार की बिमारियों को जन्म दे रही हैं।

 

उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाली विभिन्न प्रकार की गैंसे कार्बन डाई आॅक्साइड, कार्बन मोनो-आॅक्साइड, सल्फर डाई-आक्साइड आदि हाइड्रोकार्बन्स, धुआं इत्यादि वायु-प्रदूषण के प्रमुख कारक है। आधुनिक कृषि पद्धति से भी वायु प्रदूषण बढ़ा है।

 

 

संदर्भ ग्रंथ

1. शर्मा बी0एल0 ‘कृषि भूगोलसाहित्य भवन आगरा सन् 1989 पृ0सं0 - 155

2. Najumaul Karim A.K. Change in Society of Indian and Pakistan Ideal Pub. 1961 P. 30

3. डाॅ0 प्रसाद गायत्री एवं डाॅ0 नौटिपाल राजेश, पर्यावरण भूगोल, शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद सन् 2006, पृ00 - 273

4. डाॅ0 प्रसाद गायत्री एवं डाॅ0 नौटिपाल राजेश, पर्यावरण भूगोल, शारदा पुस्तक भवन, इलाहाबाद सन् 2006, पृ00 - 273

5. सिंह सविन्द, पर्यावरण भूगोल, प्रयाग पुस्तक भवन, इलाहाबाद सन् 2011 पृ0. 485

6. डाॅ0 प्रसाद गायत्री एवं डाॅ0 नौटिपाल राजेश, पर्यावरण भूगोल, शारदा पुस्तक भवन, सन् 2006, पृ0सं0 - 309

7. डाॅ0 मामोरिया एवं डाॅ0 जोशी, पर्यावरण अध्ययन, साहित्य भवन पब्लिकेशन आगरा सन् - 2013, पृ0सं0 - 69

 

 

Received on 24.08.2021         Modified on 18.09.2021

Accepted on 21.10.2021         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(3):154-159.